विशेष रिपोर्ट: लखनऊ से (संपादकीय लेख)
क्या कोई तकनीक या सरकारी फाइलों में छुपा एक छोटा सा ‘लूपहोल’ किसी की मौत का जरिया बन सकता है? लखनऊ के अलीगंज में जो हुआ, उसे सिर्फ एक ‘हादसा’ कहना उन 15 परिवारों के साथ क्रूर मजाक होगा जिन्होंने अपने बच्चों को खोया है। यह सीधे तौर पर लापरवाही और सिस्टम की नाकामी का वह खौफनाक चेहरा है, जिसने हंसते-खेलते बच्चों को पल भर में राख के ढेर में बदल दिया।
सोमवार, 22 जून 2026 की उस दोपहर को याद करके आज भी चश्मदीदों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। लेकिन इस मामले में जो सबसे बड़ा और हैरान करने वाला खुलासा हुआ है, वह पोस्टमार्टम रिपोर्ट से आया है।
आग से नहीं, घुट-घुट कर थमीं सांसें
डॉक्टरों के मुताबिक, अलीगंज के ऊषा मेहता मार्ग पर बनी उस तीन मंजिला इमारत में जान गंवाने वाले 15 लोगों में से किसी के भी शरीर पर गहरे घाव या जलने के ऐसे निशान नहीं थे जो सीधे मौत की वजह बन सकें। इन सभी की मौत ‘एस्फिक्सिएशन’ यानी दम घुटने से हुई।
जब इमारत के निचले हिस्से में शॉर्ट-सर्किट के कारण आग भड़की, तो वहां मौजूद प्लास्टिक, फोम और सिंथेटिक सामानों ने जलने पर बेहद जहरीली कार्बन मोनोऑक्साइड गैस छोड़ी। बंद कमरों के भीतर इस जहरीले धुएं ने कुछ ही सेकेंड में ऑक्सीजन को सोख लिया। पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टरों ने बताया कि कई बच्चों के चेहरे और आंखों पर भारी सूजन थी और उनकी नाक के भीतर कालिख जमी हुई थी। वे चिल्लाते रहे, भागने की कोशिश करते रहे, लेकिन जहरीली हवा उनके फेफड़ों में जमती चली गई।
‘स्मार्ट’ बायोमेट्रिक लॉक बना काल का दरवाजा
इस त्रासदी में सबसे ज्यादा दिल दहला देने वाली बात यह रही कि बच्चे बाहर क्यों नहीं भाग पाए? जांच में सामने आया है कि दूसरी मंजिल पर चल रहे एनीमेशन सेंटर के मुख्य दरवाजे पर एक मॉडर्न ‘बायोमेट्रिक लॉक’ लगा हुआ था।
जैसे ही इमारत में शॉर्ट-सर्किट हुआ, बिजली चली गई। कायदे से इस सुरक्षा लॉक को अपने आप खुल (default open) जाना चाहिए था, लेकिन तकनीकी खराबी के कारण यह लॉक पूरी तरह से जाम हो गया। अंदर मौजूद छात्रों ने बाहर निकलने के लिए दरवाजे को पीटा, धक्का दिया, लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ। खिड़कियां भी कांच की थीं और उनमें से धुआं बाहर नहीं निकल पा रहा था। छात्र एक ऐसे गैस चैंबर में तब्दील हो चुके कमरे में कैद हो गए जहां से बाहर निकलने का सिर्फ एक ही संकरा रास्ता था, और वह भी धुएं के गुबार से घिरा हुआ था।
नेशनल बिल्डिंग कोड का वो जानलेवा ‘लूपहोल’
जब हमने इस इमारत के कानूनी दस्तावेजों की पड़ताल की, तो सिस्टम का एक और घिनौना सच सामने आया। अग्निशमन विभाग (Fire Department) के अधिकारियों का कहना है कि इमारत के मालिकों ने पिछले 13 वर्षों में कभी भी फायर एनओसी (No Objection Certificate) के लिए आवेदन ही नहीं किया था।
आखिर ऐसा कैसे संभव हुआ? दरअसल, नेशनल बिल्डिंग कोड (NBC) 2016 के नियमों के अनुसार, 15 मीटर से कम ऊंचाई और 500 वर्ग मीटर से कम क्षेत्रफल वाली व्यावसायिक या रिहायशी इमारतों को फायर एनओसी लेना अनिवार्य नहीं था। अलीगंज की यह इमारत लगभग 12 मीटर ऊंची थी और इसका कुल क्षेत्रफल करीब 185 वर्ग मीटर था। इसी कानूनी ‘लूपहोल’ यानी तकनीकी छूट की आड़ लेकर इमारत के मालिकों ने कभी भी कोई फायर ऑडिट नहीं कराया और प्रशासन आंखें मूंदे बैठा रहा।
कागजों पर हुई ‘मौत’, लेकिन हकीकत में चलती रही दुकान
इस कहानी में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाइए कि लखनऊ विकास प्राधिकरण (LDA) ने साल 2016 में ही इस रिहायशी इमारत में अवैध रूप से चल रहे व्यावसायिक निर्माण को ढहाने (Demolition Order) का आदेश जारी किया था। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इस आदेश के जारी होने के ठीक दो महीने बाद, 5 जुलाई 2016 को इस ध्वस्तीकरण के फैसले को रहस्यमयी ढंग से वापस ले लिया गया। आखिर किस रसूखदार के दबाव में इस मौत की इमारत को दोबारा चलने की इजाजत दी गई? यह आज लखनऊ का हर नागरिक पूछ रहा है।
सरकार की कार्रवाई और विपक्ष के तीखे सवाल
हादसे के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सख्त रुख के बाद आनन-फानन में चार बड़े अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है, जिनमें बिजली विभाग, एलडीए और फायर सेफ्टी के जिम्मेदार लोग शामिल हैं। पुलिस ने इमारत के मालिक वीरेंद्र प्रसाद शुक्ला और एनीमेशन सेंटर के संचालक तुषांक कृष्ण जैसवाल समेत चार आरोपियों को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। साथ ही पूरे उत्तर प्रदेश और पड़ोसी राज्यों में अवैध रूप से बेसमेंट और बिना एनओसी के चल रहे कोचिंग सेंटरों और लाइब्रेरी को सील करने का एक बड़ा अभियान शुरू हो गया है।
लेकिन विपक्ष ने इस कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने सीधे तौर पर कहा है कि अगर समय रहते सुरक्षा मानकों को लागू कराया गया होता, तो आज ये 15 बच्चे जिंदा होते। उन्होंने आपातकालीन सेवाओं (112) की लेटलतीफी पर भी निशाना साधा। वहीं, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने आरोप लगाया है कि सरकार केवल छोटे प्यादों को सस्पेंड करके उन बड़ी मछलियों को बचा रही है जिन्होंने 2016 में इस अवैध इमारत के डिमोलिशन ऑर्डर को रुकवाया था।
पत्रकार की कलम से: क्या अब भी नहीं जागेंगे हम?
यह पहली बार नहीं है जब किसी कोचिंग सेंटर या व्यावसायिक परिसर में बच्चों की जान गई हो। दिल्ली के मुखर्जी नगर से लेकर सूरत के तक्षशिला कॉम्प्लेक्स और अब लखनऊ के अलीगंज तक—कहानी हर बार एक जैसी होती है। वही संकरी सीढ़ियां, वही नियमों को ताक पर रखकर बनाए गए बेसमेंट, वही कागजी लूपहोल्स और वही अधिकारियों की रिश्वतखोर आंखें।
जब तक हम सुरक्षा मानकों को केवल फाइलों का पेट भरने का जरिया समझेंगे, तब तक ऐसी ‘प्रशासनिक हत्याएं’ होती रहेंगी। आज सवाल केवल अलीगंज के उस बायोमेट्रिक लॉक का नहीं है, बल्कि उस पूरे सिस्टम का है जो चंद रुपयों की खातिर मासूम बच्चों की जिंदगी को दांव पर लगा देता है। क्या इन 15 मौतों के बाद भी लखनऊ और देश के अन्य शहरों के अभिभावक अपने बच्चों को सुरक्षित महसूस कर पाएंगे? इसका जवाब प्रशासन को कागजों पर नहीं, जमीन पर देना होगा।
